रविवार, 2 नवंबर 2014

                                        पुराने सिक्के
        पुराने सिक्कों से मेरा तात्पर्य उन सिक्कों से कतई नहीं है जो पूरा महत्व के हैऔर एंटीक्स में शुमार होते हैं बल्कि पुराने सिक्कों से मेरा अभिप्राय उन सिक्कों से है जो चलन से बाहर हो गए हैं यानि की अब कहीं भी नहीं चलतेऔर तो और आज तो इनको छोटे बच्चे और भिखारी ही नहीं लेते हैं हां हम इन पुराने सिक्कों के इस दावे को पूरी तरह से ख़ारिज तो नहीं कर सकते कि कभी इनका भी एक दौर था,मगर इतना तो कह ही सकते हैं कि रहा होगा कभी इनका भी कोई दौर अपनी बला से,हमने तो इनका कोई दौर देखा नहीं है।ओर जिन्होंने इनका दौर देखा है वो शायद यह भी जानते होंगे कि ये "चवन्नियां" जिसकी जेब से निकल कर रूपये में चलती होगी। भला यूं किसी की जेब से निकल चलना भी कोई चलना होता है , किसी की जेब से निकल कर अपनी कीमत से ज्यादा मौल में चलना किसी सिक्के का अपना कोई बाजार मूल्य नहीं होता बल्कि वो तो उस जेब की धौंस होती होती थी जिसमें ये सिक्के पड़े रहते थे। मगर हां,आज इनके तेवर देख कर तो यकीन के साथ कहा जा सकता है कि इन पुराने सिक्कों ने तब अपना मूल्य कुछ ज्यादा ही आंक लिया होगा और वो गलत फहमी आज भी ज्यों की त्यों पाले हुए हैं, भाई मेरे इतना भी नहीं जानते कि कोई भी नई मुद्रा किसी भी पुरानी मुद्रा को बाजार से बाहर कर देती है,गया तुम्हारा भी दौर तुम्हारी उस जेब के साथ ही
      जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौर में समझदार हुए बचों को सारे ही खद्दर धारी  जन सेवा को उद्द्यत दिखलाई पड़तें है ठीक उसी तरह से अपनी बुलंदी की ख्याम खयाली में"कोमा" में गए ये पुराने सिक्कों को अपने से ज्यादा तौल मौल वाला कोई और दिखलायी ही नहीं पड़ता वैसे इन चलन से खारिज हुए घिसे पिटे इन पुराने सिक्कों को मालूम हो तो सिक्कों का मौल तीन तरह का होता है,पहली इनका अंकित मूल्य जो ये अपना मन चाह मौल खुद ही आंक बैठे हैंदूसरा वास्तविक मूल्य जो सिक्के से प्राप्त असले की वैकल्पिक उपयोगिता से आंका जाता है और जो बाज सिक्कों का"शिफर" होता है।और तीसरा होता है बाजार मूल्य जो किसी मुद्रा की साख पर निर्भर होता है और पुराने सिक्कों की साख चलन से बाहर ही जाने के बाद क्या रह जाती है वो किसी से भी छुपी नहीं होती। इतना सब होने के बाद भी इन पुराने सिक्कों को के समझ में क्यों नहीं आता कि खुद अपने आप कीमत आंकने से कोई कीमती नहीं हो जाता,बिकने पर मौल तो वो ही मिलने वाला है जो खरीददार थमता है
         इन पुराने सिक्कों का हस्र भी इनकी आँखें खोलने के लिए नाकाफी है ।जब किसी कृपण बाप की शवयात्रा के दौरान उसकी कंजूस औलाद इन्ही बाजार से ख़ारिज पुराने सिक्कों को ही उछालती,किसी ने इनका कोई और इस्तेमाल होते कहीं नहीं देखा। अलबता इन पुराने सिक्कों को देहाती लोग काले धागे में पिरोकर छोटे बच्चों की कमर में जरूर बांधा करते है जिसके पीछे भी शायद बेकार से बेकार चीज को भी कहीं न फेंकने की मानसिकता हो सकती है या कोई अंधविश्वास,यह तो उनकी वो जाने मगर यहां आकर के इन पुराने सिक्कों की बड़ी फजीहत सी ही होती है,क्यों कि काले धागे में इन पुराने सिक्कों के साथ जरख,भालू,उल्लू और की हड्डियाँ ओर दांत भी पिरोये हुए होते हैं
         और इन पुराने सिक्कों को"जेब में रखने" की कह कर भी कोई अपनी जेब की हेठी नहीं करवाना चाहता मगर ये किसी खाली पड़ी जेब में जब ये पुराने सिक्के जमा हो लेते हैं तो अपनी तरह से ही सही बजते जरूर हैं। इनकी खनक तो कभी की ख़त्म हो चुकी होती है मगर ये अपनी चमक का ज्यादा भरोसा करते हैं।और जब जब भी इनकी चमक कम होने के चर्चे शुरू होने लगेते है तो ये झट से खुद को"उजलवाने" पहुँच जाते हैं और इन पुराने सिक्कों ने अपनी चमक बनाये रखने की सनक में अपने मौल से ज्यादा उजालने की सामग्री जाया कर चुके हैं। इन पुराने सिक्कों के मुगालते को देख कर एक कहावत याद आती है"बर खुद गलतीदहा" भले ही इन पुराने सिक्कों का सब कुछ ख़त्म हो गया हो मगर इनको नए ज़माने के "चलते सिक्के" कभी फूटी आँख भी नहीं सुहाते। कभी कभी इन पुराने सिक्कों को कोई नया सिक्का आकर किसी भी कीमत में नहीं चलने देता तो ते पुराने सिक्कों आँखें बंद कर अपना पुराना दौर फिर आने के सपने देखने लागते हैं
                                                        दामोदर लाल जांगिड़              
  

रचना मौलिक और अप्रकाशित है

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